इस जहाँ से चले हम
उस जहाँ के लिये हम
की .....
पड़ाव हैं आज अंतिम पड़ाव
जहाँ .....
आज लाये हैं मुझे आप मेरे
यहां से ना आगे अब कोई सफर हैं
इस जहाँ से चले उस जहाँ के लिये
दिखाये अजब ही चम्तकार इसने
बंधी सांस की यह डोरी थी जब तक
अपना ही अपना दिखाया सभी कुछ
जमाने का ढ़ग ही अजब था वहा
जहा छीना झपटी ही लगीं है जहाँ में
वही ...
सभी के दिलों में विद्वेष भरा है
यहीं ....
आस दिल में थी मेरे भी जब तक
बंधी सांस की यह डोरी थी जब तक..
की....
बटोरु जहा तक बटोर संकू मैं "पैसा"
क्योंकि......
पैसा ही आज उस जहाँ का खुदा हैं
जिस जहाँ से चले उस जहाँ के लिये........
Wednesday, 31 July 2019
क्षण भृगुंर
Saturday, 12 February 2011
पुलिस वाले भी होते है ईमानदार
विगत दिनों थाना नबी करीम (दिल्ली ) की एक खबर ने मुझे बहुत हैरान कर दिया क्यों की उस खबर ने एक ऐसे पुलिस वाले पर सवालिया निशान लगा दिया जिसने पुलिस की परिभाषा ही बदलने की कोशिश की थी !मै यहा पर इस बात का उल्लेख करना चाहूगा की पुलिस वालो पर अक्सर काम ना करने का आरोप लगता ही रहता है !जो की एक हद तक तो ठीक होता है पुलिस वाले अपना काम भी ठीक से नहीं करते है और आम जनता को परेशान करते रहते है!ओंर डरा धमका कर लोगो से पैसाभी उसूलते है !पर मै यहा पर एक ऐसे पुलिस वाले का जिक्र कर रहा हू !जिसने हमारे नबी करीम सब्जी बाज़ार मे जब तक वो रहा उसने अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगा कर रखा व् आम लोगो का भरोसा भी कायम किया की पुलिस वाले भी ईमान दार होते है और अपनी जिम्मेदारी को भी निभाना जानते है !H .C KRISHAN KUMAR ने लोगो में दिल्ली पुलिस के प्रति एक विश्वास पैदा किया की पुलिस वाले भी एक इन्सान है व् दूसरों की मदद भी कर सकते है !उस दिन .31 जनवरी 2011 की रात लगभग 10 बजे मै खाना खा कर नई दिल्ली स्टेशन की और गया था वापसी मे मुझे थाना नबी करीम से कुछ पहले पार्क के पास KRISHAN KUMAR वह उनके साथ दो आदमी थे मिले क्यों की मे KRISHAN KUMAR को जनता था !सो उसी नाते उससे बातचीत होने लगी और बात करते करते वो दोनों आदमी भी साथ साथ चल रहे थे !उन्होंने शायद एक दुसरे का हाथ पकड़ रखा था !खैर मैंने उन तीनो को थाने की बाहर ही छोड़ दिया और अपने घर की अपने एक साथी के साथ वापस चला आया !कुछ दिनों के बाद मुझे लोगो से पता चला की थाना नबी करीम के दो सिपाही लाइन हाज़िर हो गए है !उन मे से एक KRISHAN कुमार भी है !जो किसी को हथ कड़ी लगा कर मरते हुए थाने लाये थे 31 जनवरी 2011 की रात लगभग 10 बजे पर इतने समय तो मै भी मिला था उनसे और उस समय जब वो और उनके साथ जो वो दो लोग थे ऐसे कोई भी बात नहीं थी !और सभी कुछ सामानए था फिर बाद मे ऐसा क्या हुआ जो एक आम आदमी ने इतना संगीन आरोप लगा दिया एक ऐसे सिपाही पर .पर जिसने पुलिस के कद को इतना उंचा उठाया जो खुद कानून का इतना आदर करता है वो कैसे उस कानून को ................? ललित भसोड़
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